Prologue: Friends, with the help of a dear friend, Sadre Alam, I am pasting my Hindi blog below. The converter used here proved as dumb as feared. Kindly do not mind the spelling errors occured in words like Krishna, Harishchandra, Shishu and such other words consist of letter Talavya Sh and Murdhanya Sh. Shyam Anand Jha
महाभारत की कई कहानियां झूठ और सच के महीन अंतर को रेखांकित करती हैं। जब गुरू द्रोण पांडवों की सेना पर कहर ढा रहे थे, उनके प्रकोप से बचने के लिए एक उपाय के बारे में सोचा गया जो झूठ पर आधारित था।
कृश्ण ने रणनीति बनाई की अगले दिन के युद्ध में अष्वत्थामा नाम के हाथी को मारा जाय और प्रचार किया जाय कि द्रोण का बेटा अष्वत्थामा मारा गया।
सच बोलने के लिए मषहूर युद्धिश्ठिर ने इसे अनुचित माना और कृश्ण की बात माानने से अस्वीकार कर दिया। लेकिन उन्हें कृश्ण ने अपनी समझदारी से आधा सच और आधा झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया।
अगले दिन हुआ भी वही। अष्वत्थामा हाथी मारा गया। और युद्ध लड़ते हुए द्रोण के कान तक बात पहुंची कि उनका बेटा मारा गया।
कृश्ण की कुटिलता से परिचित द्रोण ने समाचार के सत्यापन के लिए युद्धिश्ठिर से पूछा कि क्या सचमुच में मेरा बेटा अष्वत्थामा मारा गया ? युद्विश्ठिर ने जवाब दिया ‘जी गुरूदेव अष्वत्थामा मारा गया। ‘ कहानी के मुताबिक युद्धिश्ठिर के इतना कहते ही कृश्ण ने जोर से षंख बजाया और द्रोण युद्धिश्ठिर के कथन का उत्तराषं - लेकिन नर नहीं, हाथी‘, नहीं सुन पाए।
इस बात पर अभी भी बहस हो सकती है कि युद्धिश्ठिर ने जो कहा वो सच था या झूठ ? विष्वास ना हो तो राम से पूछिए। वह चाहें तो दोनों बातें साबित कर सकते हैं। आप सहमत हों या ना , बला से। राम कौन ? राम जेठमलानी।
खैर, भारत की पौराणिक और धार्मिक कहानियों से पता चलता है कि अपने यहंा झूठ बोलने की लंबी परंपरा है। इसलिए सच का आग्रह भी कुछ ज्यादा है। सच बोलने वाले ज्यादातर वे क्षत्रिय राजकुमार हैं , जो भले ही बलवान हों लेकिन उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता संदीग्ध है।
राम से पहले राजा हरिष्चंद्र की कहानी हम जानते हैं। कहानी के मुताकिब हरिष्चंद्र षायद राम के पूर्वज ही थे। हरिष्चंद्र सत्य तो बोलते थे , लेकिन उनकी सत्यता में विलक्षणता का अभाव है। सत्य हठ बन जाता है। हरिष्चंद्र की कहानी भोंडे ढंग से नाटकीय और भावुक है। इतना नाटकीय है कि अविष्वसनीय है। जो इंसान सपने और जीवन के फर्क को ना समझ ना पाए , उससे और क्या उम्मीद कर सकते हैं !
सत्य के प्रति राम का आग्रह भी मूलतः उनके बल का आग्रह ही था। राम को अगर कुछ वाल्मीकि , कंबन , तुलसी , और रामानंद सागर जैसे कवि कहानीकारों का साथ नहीं मिला होता तो, हमें उनके सत्य प्रेम से ज्यादा उनके बल प्रेम के बारे में पता होता।
भारतीय देवताओं में ज्यादातर बाहुबली क्षत्रिय हैं , जिनके चरित्र में हास - परिहास और जीवन के रंग का भारी अभाव है। अपने अनुभव से हम इस बात को समझ सकते हैं कि अपने बल और सामथ्र्य में अंधा विष्वास रखने वाला कभी अपनी वाक्षक्ति पर भरोसा नहीं करता। रामायण की कहानी में कोई ऐसा अंष नहीं है जब आप राम के वाक्चातुर्य से मोहित हो जांय।
ये गुण कृश्ण में थे। इसलिए कृश्ण को झूठ से कोई परेषानी नहीं है। वह झूठ बोलते भी हैं और झूठ बोलने वाले को प्रश्रय भी देते हैं।
झूठ को पाप घोशित किए जाने के पीछे इन्हीं बलवादी देवताओं के समर्थकों का हाथ है। जो भी हो , झूठ के बिना दुनियावी इंसान का काम नहीं चल सकता। हम अक्सर झूठ का सहारा ऐसी ही परिसिथतियों में लेते हैं जहां सच हमें मुष्किल में डाल सकता है। अपनी इन्हीं सरल उपयोगिता के कारण ही झूठ ने एक सामाजिक स्वीकृति हासिल की है। हम हर बात पर सच का आग्रह नहीं करते। कर भी नहीं सकते।
लेकिन विडंबना है कि झूठ का सहारा लेकर जीने वाले आप-हम जैसे तमाम लोग झूठ और झूठ बोलने वाले को कोसने का कोई अवसर नहीं छोडते। बात-बात में यह कहना कि ‘ये झूठ है , गलत है या फिर कि फलां आदमी पर विष्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वो झूठ बोलता है , झूठ और झूठ बोलने वालों की सामाजिक प्रतिश्ठा में बड़ी बाधा पैदा करती है।
जो लोग सच को सर पर लेकर घूमते हैं , वे भी बगल में झूठ की गठरी दवाए रखते हैं। हमारे यहां तो लोग झूठ की खेती करने का आरोप दूसरे पर लगाते हैं , लेकिन झूठ की फसल काट कर अपना गुज़ारा चलाते हैं।
अगर हम आज के सूचना युग और सूचना समाज को देखें तो यहां एक चीज जो सबसे ज्यादा झूठ बेची या खरीदी जाती है वह है झूठ। राश्टीय अंतराश्टीय स्तर के झूठ के कुछ नमूने देखिए। श्रीलंका के किसी चट्टान पर राम के पद चिन्ह दिखाई देते हैं। साईवेरिया में कहीं दूसरे ग्रह के अज्ञात जीव का षव मिलता है। भारत दुनिया का सबसे आदर्ष लोकतंत्र है। अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र और षांति स्थापित करना चाहता है। ओसामा बिन लादेन षहीद हो गया। कांग्रेस की सरकार भ्रश्टाचार से लड़ने के लिए कटिवद्ध है। भाजपा राश्टवादी पार्टी है। मायावती दलितों के उत्थान के लिए काम करती है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लायक है। करुणा की कनी ने सिनेयुग के तोरानी से 200 रूपए कर्ज लिए थे। ये इस सूचना युग और समाज के ऐसे भोंडे सत्य हैं जिन्हें जन-संचार के उपलब्ध सारे माध्यम प्रचारित प्रसारित करने में व्यस्त हैं।
समस्या इन षर्मनाक भौंडे सत्यों से नहीं हैं। सच का जाप करते हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से है। विद्यालय से लेकर न्यायालय तक और सड़क से लेकर संसद तक पिछले साठ सालों में सच की पूंछ पकड़कर राजा हरिष्चंद्र की ये संतानें आज यहां तक पहुंच चुकी है।
अगर हमने झूठ को , जीवन के रास रंग को , हास परिहास को अपने सार्वजनिक संस्थानों में थोड़ी सी इज्ज़त दी होती तो हमारा सच इतना लिजलिज़ा नहीं होता।
पांडवों के पांच षिषुओं का रात के अंधेरे धोखे और छल से वध करने वाला अष्वत्थामा का मारा जाना युद्धिश्ठिर के सच बोलने से ज़्यादा जरूरी था।
ये झूठ है कि झूठ बोलना पाप है। आईये थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलते रहें , ताकि सच कहीं बेरंग ना हो जाय , सच का संज्ञान कहीं लुप्त ना हो जाय।
Shyam Anand Jha
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